कल श्रावण का पहला सोमवार था.और मुझे याद आ गया ऐसा ही एक श्रावण का सोमवार, जब मैंने बचपन में भाँग खाई थी. मैं शायद आठ साल का था तब. कानपुर में श्रावण के सोमवारों को बारी बारी से चार शिवमन्दिरों मे मेले लगा करते थे. जाजमऊ, नवाबगंज, कल्याणपुर और परमट में. शायद अब भी लगते होंगे. मेरे अभिभावक गौरी शंकर अरोड़ा जिन्हें हम चाचा कहते थे, वह किराना बाज़ार में दलाल थे.
कल्याणपुर में उनके एक आढ़ती जगन्नाथ मुनीम के मालिकों का एक धर्मशाला था. जिस सोमवार को कल्याणपुर के शिवमन्दिर का मेला था, चाचाने हम लोगों को दिन में वहाँ चले जाने को कहा था ,और वह
शाम को आ जानेवाले थे. धर्मशाला में ठहरने की व्यवस्था उन्होंने कर रखी थी. सो दोपहर से पहले ही, मैं अपनी माँ, नानी और छोटी बहन लीला रामलखन मामा के साथ एक इक्के पर बैठ कर वहाँ पहुंच गये. उस समय मेरी उम्र शायद सात आठ साल की रही होगी.
मन्दिर में शिवजी को जल चढ़ाया और धर्मशाले में आकर कुछ फलाहार करके विश्राम किया. सबने उपवास किया हुआ था. शाम होने लगी तो मैं अम्मासे पूछ्कर मेला देखने के लिये निकल पड़ा.
धर्मशाला से बाहर देखा, कुछ लोग बैठे नाश्ता कर रहे थे. और साथ साथ हँस रहे थे. मैं उनको देखने लगा तो उनमें से एक आदमी ने मुझे बरफ़ी का एक टुकड़ा देकर बोला - लेव बच्चा, भोले बाबा का पर्साद लेव. बरफ़ी का रंग कुछ हरा सा था. मैं लेने से हिचकिचा रहा था तो दूसरा व्यक्ति बोला, लै लेव मुन्ना, पर्साद को ना ना करै के चाही. मैंने वह टुकड़ा लेकर माथे से लगाया और खा लिया. फिर एक और व्यक्ति ने एक कुल्हड़ में थोड़ी सी ठंडाई देकर कहा, लेव यहौ पी लेव. ठंडाई मैं जानता था, घर में चाचा भी अक्सर बनाया करते थे. मैंने ठंडाई भी पी ली. और आगे बढ़ गया, मेला देख्नने के लिये. सोच रहा था अगर कोई चीज़ पसन्द आई तो चाचा के आने के बाद उनसे वह चीज़ ले देने को कहूंगा. काफ़ी घूम कर देखा , मगर कुछ ऐसा खा़स नहीं देखा , जो मेरे पास न रहा हो. मैं आगे बढ़ गया. आगे रेल की पटरी थी. मैं दो पटरियों के ठीक बीचोबीच लकड़ी के स्लीपरों पर एक ताल के साथ, लेफ़्ट राइट करता हुआ आगे बढ़ने लगा. ताल पर चलने में बड़ा मज़ा आ रहा था.
थोड़ी दूर ही गया था कि पीछे से रेल की सीटी की आवाज़ सुनाई दी. मैंने मुड़ कर एक बार देखा और फिर आगे चलने लगा. उसके बाद तो सीटी की आवाज़ बार बार आने लगी. मैंने मुड़ कर देख और मन ही मन बुदाया - क्या भों-भों लगा रखी है, इधर उधर इतनी जगह तो पड़ी है, बगल से निकल क्यों नहीं जाता. और फिर आगे बढ़ने लगा. फिर सीटी की आवाज़ बन्द हो गई. मैंने सोचा चलो अच्छा हुआ.
हुआ यह था कि ट्रेन रुक गई थी, और मुसाफ़िर उतर कर दौड़ते हुये मेरी तरफ़ आरहे थे. कुछ लोगों ने आकर मुझे उठा कर पटरी से बाहर किया. मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर हुआ क्या. इसी समय चाचा सामने आ गये. और उन्होंने वहीं उसी समय मेरी पिटाई शुरू कर दी. चाचा प्यार तो बहुत करते थे, पर ग़लती करने पर मारते भी बहुत थे. दो चार तमाचे मारने के बाद मेरी निगाहें देख कर वह शाय्द कुछ समझ गये. मुझसे पूछा कि मैंने क्या कुछ खाया था? मैंने बर्फ़ी और ठंडाई की बात बतादी.
वह समझ गये कि मुझे किसी ने भाँग खिला दी है. वह मुझे लेकर धर्मशाले तक आये, मगर वह अजनबी लोग तब तक वहाँ से जा चुके थे.
पर उसदिन मेरी समझ में आगया कि भाँग कितना ख़तरनाक नशा है. उसके बाद ज़िन्दगी में शायद ही कभी भोले बाबा का ऐसा प्रसाद ग्रहण किया हो?
एक नसीहत और मिल गयी, कि अनजान व्यक्तियों की दी हुई कोई चीज़ खाना भी कितना खतरनाक हो सकता है?
Tuesday, July 14, 2009
Friday, June 12, 2009
कहानी चलती का नाम गाड़ी की
एक हमारे अज़ीज़ हैं लल्लन मियाँ. कई फ़िल्मों में हमारे सहकर्मी रह चुके हैं. अकसर जब उनको कोई नई बात सूझती है तो सवेरे सवेरे फोन कर लेते हैं और कोई सवाल दाग़ देते हैं. ऐसे ही एकदिन पूछ बैठे- चलती का नाम गाड़ी की कहानी किसकी थी? सवाल दिलचस्प था. आज उनके उसी सवाल का जवाब लिख रहा हूँ. क्यॊंकि इस कहानी की भी एक अलग कहानी है.
किशोर कुमार ने एक बंगला फ़िल्म बनाई थी - लूकोचुरी. उसके निर्देशक थे कमल मजूमदार. फ़िल्म को बहुत कामयाबी मिली. तब किशोर ने एक हिन्दी फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया. एस.डी.बर्मन के एक सहकारी थे, सुहृद कर. उन्होंने एक कहानी किशोर को सुनाई. कहानी उनको अच्छी लगी, कहानी में तीनों भाइयों के लिये चरित्र थे, मगर उसमें तीनों तीन भाई न थे. निर्देशन का भार कमल मजूमदार को ही देने की बात थी. कहानी क्या थी, यह मुझे नहीं मालूम. फ़िल्म शुरू होने से पहले ही कमल मजूमदार ने कह दिया कि वह निर्देशन न कर सकेंगे. तब किशोर ने सत्येन दा से बात की. सत्येन दा निर्देशन के लिये तो तैयार हो गये, मगर कहानी उनको नहीं जमी. उनका कहना था, कि सारे लोग जानते हैं कि तीनों अभिनेता भाई हैं, तो फ़िल्म में भी भाई-भाई ही क्यों न हों? और तीनों जैसे हैं वैसे ही चरित्र अदा करें तो फ़िल्म दिलचस्प बन सकती है. आइडिया सबको अच्छा लगा. गाड़ियों के गैरेज का आइडिया पहली कहानी में भी था, उसी गैरेज को केन्द्र बना कर कहानी का ताना बाना बुना गया. उसमें कुछ कुछ अवदान अशोक कुमार का था, कुछ किशोर का और बाकी बुनावट सत्येन दा की. वह इन तीनों भाइयों से बहुत ही अच्छी तरह वाकिफ़ थे, इसलिये सबके चरित्र बहुत ही वास्तविक और स्वाभाविक बन गये. और फ़िल्म शुरू हो गई. पहले फ़िल्म के सम्वाद रमेश पन्त लिखने वाले थे. शुरुवाती शूटिंग के कुछ सीन उन्होंने लिखे भी थे. फिर क्या बात हुई पता नहीं, यह भार मेरे ज़िम्मे आ गया.
फ़िल्म की शूटिंग में जो मज़ा आता था, वह बहुत कम शूटिंगों मे आता है. बिना किसी टेन्शन के बिल्कुल हँसते हँसाते काम हुआ करता था. ब्लैक ऐन्ड व्हाइट फ़िल्मों की शूटिंग मे अपेक्षाकृत अधिक समय लगता था. मगर कोई भी सेट छोड़ कर नहीं जाता था. सम्वादों में भी सेट पर ही चर्चा होती थी और कभी कभी नये सिरे से भी लिखने होते थे. मगर मुझे कोई दिक्क़्त नहीं होती थी, क्योंकि जीते जागते वह चरित्र सामने होते थे.
फ़िल्म के संगीत का भी निस्संदेह उसकी सफलता में बड़ा योगदान था. मजरूह साहब बर्मन दादा और किशोर स्वयं हर गीत को मिल कर सजाते सँवारते थे. फ़िल्म के टाइटिल्स का अनोखा आइडिया भी पूर्णतः किशोर कुमार का था.
अफ़सोस उसका सिक्वेल न बन सका, जैसा कि सत्येन दा ने कुछ कुछ सोचा था, और जिसमें बनाया जाता तो अमित कुमार हीरो होते, गैरेज तो रह्ता ही रह्ता.
मुझे सचमुच गर्व है जिन चार एवरग्रीन और अमर फ़िल्मों के साथ मेरा नाम जुड़ा है, उनमें से चलती का नाम गाड़ी अन्यतम है.
किशोर कुमार ने एक बंगला फ़िल्म बनाई थी - लूकोचुरी. उसके निर्देशक थे कमल मजूमदार. फ़िल्म को बहुत कामयाबी मिली. तब किशोर ने एक हिन्दी फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया. एस.डी.बर्मन के एक सहकारी थे, सुहृद कर. उन्होंने एक कहानी किशोर को सुनाई. कहानी उनको अच्छी लगी, कहानी में तीनों भाइयों के लिये चरित्र थे, मगर उसमें तीनों तीन भाई न थे. निर्देशन का भार कमल मजूमदार को ही देने की बात थी. कहानी क्या थी, यह मुझे नहीं मालूम. फ़िल्म शुरू होने से पहले ही कमल मजूमदार ने कह दिया कि वह निर्देशन न कर सकेंगे. तब किशोर ने सत्येन दा से बात की. सत्येन दा निर्देशन के लिये तो तैयार हो गये, मगर कहानी उनको नहीं जमी. उनका कहना था, कि सारे लोग जानते हैं कि तीनों अभिनेता भाई हैं, तो फ़िल्म में भी भाई-भाई ही क्यों न हों? और तीनों जैसे हैं वैसे ही चरित्र अदा करें तो फ़िल्म दिलचस्प बन सकती है. आइडिया सबको अच्छा लगा. गाड़ियों के गैरेज का आइडिया पहली कहानी में भी था, उसी गैरेज को केन्द्र बना कर कहानी का ताना बाना बुना गया. उसमें कुछ कुछ अवदान अशोक कुमार का था, कुछ किशोर का और बाकी बुनावट सत्येन दा की. वह इन तीनों भाइयों से बहुत ही अच्छी तरह वाकिफ़ थे, इसलिये सबके चरित्र बहुत ही वास्तविक और स्वाभाविक बन गये. और फ़िल्म शुरू हो गई. पहले फ़िल्म के सम्वाद रमेश पन्त लिखने वाले थे. शुरुवाती शूटिंग के कुछ सीन उन्होंने लिखे भी थे. फिर क्या बात हुई पता नहीं, यह भार मेरे ज़िम्मे आ गया.
फ़िल्म की शूटिंग में जो मज़ा आता था, वह बहुत कम शूटिंगों मे आता है. बिना किसी टेन्शन के बिल्कुल हँसते हँसाते काम हुआ करता था. ब्लैक ऐन्ड व्हाइट फ़िल्मों की शूटिंग मे अपेक्षाकृत अधिक समय लगता था. मगर कोई भी सेट छोड़ कर नहीं जाता था. सम्वादों में भी सेट पर ही चर्चा होती थी और कभी कभी नये सिरे से भी लिखने होते थे. मगर मुझे कोई दिक्क़्त नहीं होती थी, क्योंकि जीते जागते वह चरित्र सामने होते थे.
फ़िल्म के संगीत का भी निस्संदेह उसकी सफलता में बड़ा योगदान था. मजरूह साहब बर्मन दादा और किशोर स्वयं हर गीत को मिल कर सजाते सँवारते थे. फ़िल्म के टाइटिल्स का अनोखा आइडिया भी पूर्णतः किशोर कुमार का था.
अफ़सोस उसका सिक्वेल न बन सका, जैसा कि सत्येन दा ने कुछ कुछ सोचा था, और जिसमें बनाया जाता तो अमित कुमार हीरो होते, गैरेज तो रह्ता ही रह्ता.
मुझे सचमुच गर्व है जिन चार एवरग्रीन और अमर फ़िल्मों के साथ मेरा नाम जुड़ा है, उनमें से चलती का नाम गाड़ी अन्यतम है.
Tuesday, June 2, 2009
वो दिन वो लोग -नर्गिस
नर्गिस का फ़ैन तो मैं उनकी पहली फ़िल्म ’तक़दीर’ से ही था, पर उनके साथ काम करने का सुयोग मिला उनकी आख़िरी फ़िल्म ’रात और दिन’ में. फ़िल्म बनते बनते और रिलीज़ होते होते कई कारणों सात साल लग गये. फ़िल्म शुरू हुई थी सन १९६० में और रिलीज़ हुई १९६७ में. इतने लम्बे समय में उनको क़्ररीब से देखा, जाना और समझा.उन्हीं दिनों के कुछ अनुभव यहां लिखने जा रहाहूं. स्वभाव से इतनी सरल, मृदुभाषी और हंसमुख कि लगता ही नहीं था कि कितनी बड़ी अभिनेत्री हैं. अल्प परिचय में भी अत्यंत आत्मीयता ही झलकती थी उनके व्यवहार में. ’रात और दिन’ उनके घर की ही फ़िल्म थी, परिवार के ही काफ़ी लोग जुड़े हुये थे. शूटिंग पर भी घर के लोग आते जाते रह्ते थे और वो सब उनको बेबी कह कर बुलाते थे. और हम लोग भी उन्हें बेबी जी कह कर ही बुलाने लगे थे - निर्देशक सत्येन दा, कैमरामैन मदन सिन्हा, मैं और अन्य सहकारीगण भी. उन्होंने भी कभी मना नहीं किया. मैडम कहलाना शायद उन्हें स्वयं भी बहुत पसन्द नहीं था. रोज़ जब वह शूटिन्ग के लिये आती थीं, तो गाड़ी से उतर कर पहले सेट पर आती थीं, सब से मिल कर, पहले कौन सा सीन करना है पूछ कर तैयार होने के लिये मेक अप रूम जाती थीं और बस दस बारह मिनट में तैयार होकर सेट पर आ जाती थीं. इतने कम समय में तैयार होकर सेट पर आ जाये, ऐसी कोई हीरोइन तो क्या, कोई हीरो भी मैंने नहीं देखा.
किन्तु एकदिन वह आईं तो सेट के बाहर से ही मुझे बुला भेजा पूछा कि क्या सीन करना है और सीधे मेक अप रूम चली गईं. मैंने ड्राइवर अब्दुल से पूछा क्या बात है, आज मैडम का मूड कुछ बिगड़ा हुआ सा क्यों है? उसने बताया कि सवेरे सवेरे एक हीरोइन के सेक्रेटरी को फट्कार सुना कर आई हैं. मालूम हुआ कि नर्गिस और अन्य कुछ बड़े कलाकारों में एक ऐसी अन्डरस्टैंडिंग है, कि अगर कोई ज़रूरतमन्द इन लोगों में से किसी के पास मदद के लिये आता है तो वह ख़ुद तो अपनी तरफ़ से जो देना होता है, देते ही हैं और एक एक नोट लिख कर बाक़ियों के पास भेज देते हैं. और उस ज़रूरतमन्द का काम बन
जाता है. ऐसे ही कुछ दिन पहले, एक पुरानी चरित्राभिनेत्री अपनी बेटी की शादी के लिये, मदद मांगने नर्गिस के पास आई थी, उन्होने स्वयं जो देन था दिया, और अन्य कई लोगों के लिये चिट्ठी लिख कर दे दी. आज सवेरे वह चरित्राभिनेत्री बेटी की शादी के बाद कुछ मिठाई लेकर शुक्रिया अदा करने आई थी. नर्गिस के पूछ्ने पर उसने बताया कि शादी बहुत अच्छी तरह हो गयी. मदद भी सबने कर दी थी, मगर उक्त सेक्रेटरी ने, उसे उस हीरोइन से मिलने नहीं दिया, जिसके नाम चिट्ठी दी थी. उसने चिट्ठी फाड़कर फेंक दी थी, और बहुत बुरा भला भी कहा था. इसलिये मैडम का मूड ख़राब हो गया था. और
ऐसे मूड में शूटिंग के लिये निकली ही थीं कि आगे मोड़ पर वही सेक्रेटरी साहब खड़े दिखाई दे गये. बस मैडम ने गाड़ी रुकवाई और उतर कर उन सेक्रेटरी साहब पर बरस पड़ीं. बेचारे पब्लिक के सामने शर्मसार होते रहे और माफ़ी मांगते रहे. गालियां तो नर्गिस ऐसी धारा-प्रवाह दे लेती थीं कि तौबा.
बाद में तैयार होकर जब सेट पर आईं तब तक उनका ग़ुस्सा ठंडा हो चुका था. बिल्कुल स्वाभाविक हो चुकी थीं.
यह भी उनकी अभिनय क्षमता की एक बड़ी विशेषता थी, कैसा भी मूड हो, पर कैमरे के सामने आते ही अपने चरित्र में ऐसा ढाल लेती थीं कि बस अपनी मिसाल वह आप ही थीं.
अभिनय में स्वाभाविकता के साथ साथ साज-सिंगार में भी वह स्वाभाविकता और सादगी रखना ही पसन्द करती थीं, जब तक कि चरित्र के लिये बनावट ज़रूरी न हो. इसी सिलसिले में एक दिन उन्होंने घटना सुनाई थी, जो अभी अचानक याद आगयी. बात ए.वी.एम. की फ़िल्म ’चोरी-चोरी’ की है. मद्रास के विजया-वाहुनी स्टूडिओ में फ़िल्म की पहले दिन की शूटिंग थी. नर्गिस अपने लिये निर्धरित मेक-अप रूम में पहुंची तो देखा दो पैडिंग रखे हुए थे, एक वक्ष के लिये, एक नितम्बों के लिये. नर्गिस ने मेक-अप मैन से पूछा - यह किसका है? जवाब मिला- यह आपही के लिये है. नर्गिस ने कहा- ये ले जाओ, मुझे ये सब नहीं पहनना है. मेक-अप मैन ने हाथ जोड़ कर कहा - मैडम, मयप्पन सर ने ऑर्डर किया है, ये आपको पहनने का है. नर्गिस ने कहा - सर को बोलो जाकर, कोई दूसरी हीरोइन बुला लें. मुझे यह फ़िल्म नहीं करनी है. और अन्ततः उन्होंने वह पैडिंग नहीं पहनी.
’रात और दिन’ के बाद उन्होंने काम छोड़ दिया, और पूरी तरह घर गृह्स्थी, बच्चों और समाज सेवा के कामों को समर्पित हो गईं. मगर हम अक्सर, उनके बंगले में ही स्थित ’अजन्ता आर्ट’ के डबिन्ग थियेटर में अपनी अन्य फ़िल्मों की डबिन्ग और साउन्ड इफ़ेक्ट्स रेकार्ड करने जाया करते थे, और उनसे मिल कर ही आते थे. बिना मिले चले आते थे और उनको मालूम हो जाता था तो नाराज़ होती थीं. उनकी वह आत्मीयता कभी नहीं भुलाई जा सकती.
कल पहली जून को उनका जन्मदिन था. वह जीवित होतीं तो कल अस्सी साल की हो गयी होतीं. मगर मेरे मन में आज भी वह उसी रूप में जीवित हैं, जैसा मैने उन्हें देखा और जाना था. और हमेशा ऐसे ही याद करता रहूंगा. श्रद्धा पूर्वक.
किन्तु एकदिन वह आईं तो सेट के बाहर से ही मुझे बुला भेजा पूछा कि क्या सीन करना है और सीधे मेक अप रूम चली गईं. मैंने ड्राइवर अब्दुल से पूछा क्या बात है, आज मैडम का मूड कुछ बिगड़ा हुआ सा क्यों है? उसने बताया कि सवेरे सवेरे एक हीरोइन के सेक्रेटरी को फट्कार सुना कर आई हैं. मालूम हुआ कि नर्गिस और अन्य कुछ बड़े कलाकारों में एक ऐसी अन्डरस्टैंडिंग है, कि अगर कोई ज़रूरतमन्द इन लोगों में से किसी के पास मदद के लिये आता है तो वह ख़ुद तो अपनी तरफ़ से जो देना होता है, देते ही हैं और एक एक नोट लिख कर बाक़ियों के पास भेज देते हैं. और उस ज़रूरतमन्द का काम बन
जाता है. ऐसे ही कुछ दिन पहले, एक पुरानी चरित्राभिनेत्री अपनी बेटी की शादी के लिये, मदद मांगने नर्गिस के पास आई थी, उन्होने स्वयं जो देन था दिया, और अन्य कई लोगों के लिये चिट्ठी लिख कर दे दी. आज सवेरे वह चरित्राभिनेत्री बेटी की शादी के बाद कुछ मिठाई लेकर शुक्रिया अदा करने आई थी. नर्गिस के पूछ्ने पर उसने बताया कि शादी बहुत अच्छी तरह हो गयी. मदद भी सबने कर दी थी, मगर उक्त सेक्रेटरी ने, उसे उस हीरोइन से मिलने नहीं दिया, जिसके नाम चिट्ठी दी थी. उसने चिट्ठी फाड़कर फेंक दी थी, और बहुत बुरा भला भी कहा था. इसलिये मैडम का मूड ख़राब हो गया था. और
ऐसे मूड में शूटिंग के लिये निकली ही थीं कि आगे मोड़ पर वही सेक्रेटरी साहब खड़े दिखाई दे गये. बस मैडम ने गाड़ी रुकवाई और उतर कर उन सेक्रेटरी साहब पर बरस पड़ीं. बेचारे पब्लिक के सामने शर्मसार होते रहे और माफ़ी मांगते रहे. गालियां तो नर्गिस ऐसी धारा-प्रवाह दे लेती थीं कि तौबा.
बाद में तैयार होकर जब सेट पर आईं तब तक उनका ग़ुस्सा ठंडा हो चुका था. बिल्कुल स्वाभाविक हो चुकी थीं.
यह भी उनकी अभिनय क्षमता की एक बड़ी विशेषता थी, कैसा भी मूड हो, पर कैमरे के सामने आते ही अपने चरित्र में ऐसा ढाल लेती थीं कि बस अपनी मिसाल वह आप ही थीं.
अभिनय में स्वाभाविकता के साथ साथ साज-सिंगार में भी वह स्वाभाविकता और सादगी रखना ही पसन्द करती थीं, जब तक कि चरित्र के लिये बनावट ज़रूरी न हो. इसी सिलसिले में एक दिन उन्होंने घटना सुनाई थी, जो अभी अचानक याद आगयी. बात ए.वी.एम. की फ़िल्म ’चोरी-चोरी’ की है. मद्रास के विजया-वाहुनी स्टूडिओ में फ़िल्म की पहले दिन की शूटिंग थी. नर्गिस अपने लिये निर्धरित मेक-अप रूम में पहुंची तो देखा दो पैडिंग रखे हुए थे, एक वक्ष के लिये, एक नितम्बों के लिये. नर्गिस ने मेक-अप मैन से पूछा - यह किसका है? जवाब मिला- यह आपही के लिये है. नर्गिस ने कहा- ये ले जाओ, मुझे ये सब नहीं पहनना है. मेक-अप मैन ने हाथ जोड़ कर कहा - मैडम, मयप्पन सर ने ऑर्डर किया है, ये आपको पहनने का है. नर्गिस ने कहा - सर को बोलो जाकर, कोई दूसरी हीरोइन बुला लें. मुझे यह फ़िल्म नहीं करनी है. और अन्ततः उन्होंने वह पैडिंग नहीं पहनी.
’रात और दिन’ के बाद उन्होंने काम छोड़ दिया, और पूरी तरह घर गृह्स्थी, बच्चों और समाज सेवा के कामों को समर्पित हो गईं. मगर हम अक्सर, उनके बंगले में ही स्थित ’अजन्ता आर्ट’ के डबिन्ग थियेटर में अपनी अन्य फ़िल्मों की डबिन्ग और साउन्ड इफ़ेक्ट्स रेकार्ड करने जाया करते थे, और उनसे मिल कर ही आते थे. बिना मिले चले आते थे और उनको मालूम हो जाता था तो नाराज़ होती थीं. उनकी वह आत्मीयता कभी नहीं भुलाई जा सकती.
कल पहली जून को उनका जन्मदिन था. वह जीवित होतीं तो कल अस्सी साल की हो गयी होतीं. मगर मेरे मन में आज भी वह उसी रूप में जीवित हैं, जैसा मैने उन्हें देखा और जाना था. और हमेशा ऐसे ही याद करता रहूंगा. श्रद्धा पूर्वक.
Tuesday, May 20, 2008
भोजपुरी सिनेमा सम्मान-२००८ :एक शुरुआत
आज एक अर्से बाद कुछ लिखने बैठा हूं. लिखने को तो बहुत कुछ था, कई बातें थीं, कई विचार थे, पर शारीरिक अस्वस्थता के कारण बैठ नहीं पा रहा था. अब सब कुछ लिखूंगा. लेकिन आज पहले कुछ विशेष लिखने जा रहा हूं.
पिछ्ले सप्ताह के कई दिन भोजपुरी फ़िल्में देखने का अवसर मिला. अवसर यों मिला कि ई टीवी –
यू.पी.-बिहार की ओर से एक बहुत बड़ा आयोजन किया जा रहा है – भोजपुरी सिनेमा सम्मान –
२००८, और उसके लिये श्रेष्ठता पुरस्कारों के लिये फ़िल्मों का चयन करने के वास्ते, जिस जूरी को
मनोनीत किया गया था उसका एक सदस्य मैं भी था। अन्य सदस्यों में जाने माने कैमरामैन और फ़िल्म निर्देशक लॉरेन्स डिसूज़ा, कम्प्लीट सिनेमा नामक अंगरेज़ी फ़िल्म ट्रेड मैगज़ीन के वरिष्ठ पत्रकार मोहन जी, अभिनेत्री साधना सिंह एवं कानपुर के एक सम्माननीय भाषविद् पंडित रामचन्द्र दुबे थे.
भोजपुरी सिनेमा का वास्तव में यह तीसरा दौर चल रहा है. पहला दौर शुरू हुआ था, सन-१९६१ में, स्व. बाबू विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी के साहसिक प्रयास “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो” के सफल निर्माण के साथ. उसकी सफलता के बाद तो भोजपुरी फ़िल्मों की एक लहर चल पड़ी थी. पर कुछ ही वर्षों में वह लहर थम गई. कारणों के विश्लेषण में मैं यहां नहीं जाना चाहता. दूसरा दौर शुरू हुआ सन १९७७ में फ़िल्म “दंगल” से. इस दौर में भी कई अच्छी अच्छी और सफल फ़िल्में बनीं और चलीं, पर यह दौर भी कुछ समय में समाप्त हो गया. किन्तु अब यह तीसरा दौर जो शुरू हुआ है, उसने एक स्थायी फ़िल्म उद्योग के रूप में अपने को स्थापित कर लिया है. उनका प्रचार-प्रसार बहुत व्यापक हो गया है. तमाम नये नये बाज़ार मिल गये हैं. अच्छे व्यवसाय के अवसर मिल गये हैं. और व्यावसायिक हिन्दी फ़िल्मों में नितान्त बेगानी सी मल्टीप्लेक्स कल्चर और कॉर्पोरेट
विनिवेश के आजाने से हिन्दी फ़िल्मों का स्वरूप ही बदलने लगा है. ऐसे में आंचलिक फ़िल्मों के लिये स्वाभविक रूप से एक जगह बन गई है, जहां साधारण दर्शक अपनी संस्कृति, अपने परिवेश,
अपने जीवन से तादात्म्य स्थापित कर सकता है. इसी कारण भोजपुरी फ़िल्मों को अपनी जगह बना
लेने में सफलता मिल रही है. यह एक अच्छा लक्षण है, स्वस्थ लक्षण है. आज तमाम भोजपुरी फ़िल्में बन रही हैं, चल रही हैं. ऐसा भी नहीं है कि सभी फ़िल्में सफल हो रही हों, पर प्रयास तो जारी है. कुछ कमियां भी नज़र आ रही हैं. ऐसे में अगर अच्छे प्रयासों को प्रोत्साहन मिले, सम्मान मिले तो निश्चित रूप से बनाने वालों का हौसला बढ़ेगा, quantity के बजाय quality पर भी ध्यान दिया जाने लगेगा. और इसीलिये इस दिशा में ETV का यह आयोजन पहला आयोजन है और एक सराहनीय और स्वागत योग्य आयोजन है.
इस आयोजन में पुरस्कृत करने के लिये हमने २० फ़िल्में देखीं. इन फ़िल्मों की गुणवत्ता या अच्छाई बुराई की चर्चा करना यहां मेरा उद्देश्य नहीं है. पुरस्कारों के लिये चयन करते समय हमने देखी हुई फ़िल्मों की व्यावसायिक सफलता असफलता पर ध्यान देने के बजाय उनकी गुणवत्ता, उनके नैतिक
और सामाजिक मूल्यों, उनकी प्रभावोत्पादकता को आंकने का प्रयास ही किया है. और उनके हर
पक्ष पर अत्यन्त सूक्ष्मता से विचार करके, काफ़ी वादविवाद कर के, एक मत हो कर अपना निर्णय ई टीवी के संचालकों के हवाले कर दिया है. इस काम में हम कितना सफल हुये हैं यह तो दर्शक और जन साधारण ही देखेंगे, समझेंगे. किन्तु मेरा विश्वास है कि हमारा निर्णय जनता जनार्दन का मनःपूत होगा. अब मैं केवल सम्मान समारोह के पुरस्कारों के स्वरूप के बारे में कुछ बता देना चाहता हूं. वैसे तो ई टीवी वाले व्यापक प्रचार करेंगे ही- अपने चैनलों तथा अन्य माध्यमों द्वारा भी. मैं थोड़ी जानकारी दे देना चाहता हूं.
यह पुरस्कार दो वर्गों में दिये जायेंगे. पहले वर्ग में जूरी द्वारा श्रेष्ठता के लिये चयनित २० पुरस्कार
हैं. जो अभी गोपनीय ही रखे जायेंगे और जिनकी घोषणा आयोजित समारोह के समय ही की जायेगी. दूसरा वर्ग लोकप्रियता में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों का है, जिसके हर पुरस्कार के लिये जूरी ने ३-३ नामांकन किये हैं. इस वर्ग में नौ पुरस्कार हैं. और उनमें से सर्वश्रेष्ठ को दर्शकों और जन साधारण के मतदान द्वारा चुना जायेगा. मतदान के लिये ई टीवी द्वारा एक व्यापक अभियान चलाय जायेगा, ताकि अधिक से अधिक लोग इसमें भाग ले सकें.
समारोह का आयोजन जून,२००८ के प्रथमार्ध में (शायद ८ जून को) वाराणसी में किया जायेगा.
तब तक मुझे यह जानने की उत्सुकता बनी रहेगी कि दर्शक गण और जनसाधारण हमारे निर्णय से कितना सहमत होते हैं?
अन्त में केवल एक बात कहना चाहता हूं कि इस आयोजन से प्रोत्साहित होकर भोजपुरी सिनेमा
और भी प्रगति करे, अधिक से अधिक अच्छी फ़िल्में बनें और उनमें हमारी आंचलिक संस्कृति की झलक देखने को मिले और और हिन्दी फ़िल्मों से प्राय: लुप्त हो रही साहित्यिकता पनपे और बढ़े.
यही मेरी आन्तरिक कामना है.
पिछ्ले सप्ताह के कई दिन भोजपुरी फ़िल्में देखने का अवसर मिला. अवसर यों मिला कि ई टीवी –
यू.पी.-बिहार की ओर से एक बहुत बड़ा आयोजन किया जा रहा है – भोजपुरी सिनेमा सम्मान –
२००८, और उसके लिये श्रेष्ठता पुरस्कारों के लिये फ़िल्मों का चयन करने के वास्ते, जिस जूरी को
मनोनीत किया गया था उसका एक सदस्य मैं भी था। अन्य सदस्यों में जाने माने कैमरामैन और फ़िल्म निर्देशक लॉरेन्स डिसूज़ा, कम्प्लीट सिनेमा नामक अंगरेज़ी फ़िल्म ट्रेड मैगज़ीन के वरिष्ठ पत्रकार मोहन जी, अभिनेत्री साधना सिंह एवं कानपुर के एक सम्माननीय भाषविद् पंडित रामचन्द्र दुबे थे.
भोजपुरी सिनेमा का वास्तव में यह तीसरा दौर चल रहा है. पहला दौर शुरू हुआ था, सन-१९६१ में, स्व. बाबू विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी के साहसिक प्रयास “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो” के सफल निर्माण के साथ. उसकी सफलता के बाद तो भोजपुरी फ़िल्मों की एक लहर चल पड़ी थी. पर कुछ ही वर्षों में वह लहर थम गई. कारणों के विश्लेषण में मैं यहां नहीं जाना चाहता. दूसरा दौर शुरू हुआ सन १९७७ में फ़िल्म “दंगल” से. इस दौर में भी कई अच्छी अच्छी और सफल फ़िल्में बनीं और चलीं, पर यह दौर भी कुछ समय में समाप्त हो गया. किन्तु अब यह तीसरा दौर जो शुरू हुआ है, उसने एक स्थायी फ़िल्म उद्योग के रूप में अपने को स्थापित कर लिया है. उनका प्रचार-प्रसार बहुत व्यापक हो गया है. तमाम नये नये बाज़ार मिल गये हैं. अच्छे व्यवसाय के अवसर मिल गये हैं. और व्यावसायिक हिन्दी फ़िल्मों में नितान्त बेगानी सी मल्टीप्लेक्स कल्चर और कॉर्पोरेट
विनिवेश के आजाने से हिन्दी फ़िल्मों का स्वरूप ही बदलने लगा है. ऐसे में आंचलिक फ़िल्मों के लिये स्वाभविक रूप से एक जगह बन गई है, जहां साधारण दर्शक अपनी संस्कृति, अपने परिवेश,
अपने जीवन से तादात्म्य स्थापित कर सकता है. इसी कारण भोजपुरी फ़िल्मों को अपनी जगह बना
लेने में सफलता मिल रही है. यह एक अच्छा लक्षण है, स्वस्थ लक्षण है. आज तमाम भोजपुरी फ़िल्में बन रही हैं, चल रही हैं. ऐसा भी नहीं है कि सभी फ़िल्में सफल हो रही हों, पर प्रयास तो जारी है. कुछ कमियां भी नज़र आ रही हैं. ऐसे में अगर अच्छे प्रयासों को प्रोत्साहन मिले, सम्मान मिले तो निश्चित रूप से बनाने वालों का हौसला बढ़ेगा, quantity के बजाय quality पर भी ध्यान दिया जाने लगेगा. और इसीलिये इस दिशा में ETV का यह आयोजन पहला आयोजन है और एक सराहनीय और स्वागत योग्य आयोजन है.
इस आयोजन में पुरस्कृत करने के लिये हमने २० फ़िल्में देखीं. इन फ़िल्मों की गुणवत्ता या अच्छाई बुराई की चर्चा करना यहां मेरा उद्देश्य नहीं है. पुरस्कारों के लिये चयन करते समय हमने देखी हुई फ़िल्मों की व्यावसायिक सफलता असफलता पर ध्यान देने के बजाय उनकी गुणवत्ता, उनके नैतिक
और सामाजिक मूल्यों, उनकी प्रभावोत्पादकता को आंकने का प्रयास ही किया है. और उनके हर
पक्ष पर अत्यन्त सूक्ष्मता से विचार करके, काफ़ी वादविवाद कर के, एक मत हो कर अपना निर्णय ई टीवी के संचालकों के हवाले कर दिया है. इस काम में हम कितना सफल हुये हैं यह तो दर्शक और जन साधारण ही देखेंगे, समझेंगे. किन्तु मेरा विश्वास है कि हमारा निर्णय जनता जनार्दन का मनःपूत होगा. अब मैं केवल सम्मान समारोह के पुरस्कारों के स्वरूप के बारे में कुछ बता देना चाहता हूं. वैसे तो ई टीवी वाले व्यापक प्रचार करेंगे ही- अपने चैनलों तथा अन्य माध्यमों द्वारा भी. मैं थोड़ी जानकारी दे देना चाहता हूं.
यह पुरस्कार दो वर्गों में दिये जायेंगे. पहले वर्ग में जूरी द्वारा श्रेष्ठता के लिये चयनित २० पुरस्कार
हैं. जो अभी गोपनीय ही रखे जायेंगे और जिनकी घोषणा आयोजित समारोह के समय ही की जायेगी. दूसरा वर्ग लोकप्रियता में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों का है, जिसके हर पुरस्कार के लिये जूरी ने ३-३ नामांकन किये हैं. इस वर्ग में नौ पुरस्कार हैं. और उनमें से सर्वश्रेष्ठ को दर्शकों और जन साधारण के मतदान द्वारा चुना जायेगा. मतदान के लिये ई टीवी द्वारा एक व्यापक अभियान चलाय जायेगा, ताकि अधिक से अधिक लोग इसमें भाग ले सकें.
समारोह का आयोजन जून,२००८ के प्रथमार्ध में (शायद ८ जून को) वाराणसी में किया जायेगा.
तब तक मुझे यह जानने की उत्सुकता बनी रहेगी कि दर्शक गण और जनसाधारण हमारे निर्णय से कितना सहमत होते हैं?
अन्त में केवल एक बात कहना चाहता हूं कि इस आयोजन से प्रोत्साहित होकर भोजपुरी सिनेमा
और भी प्रगति करे, अधिक से अधिक अच्छी फ़िल्में बनें और उनमें हमारी आंचलिक संस्कृति की झलक देखने को मिले और और हिन्दी फ़िल्मों से प्राय: लुप्त हो रही साहित्यिकता पनपे और बढ़े.
यही मेरी आन्तरिक कामना है.
Friday, January 11, 2008
जॉनीवाकर - एक अजाना व्यक्तित्व
“वेब दुनिया” में जॉनी वाकर की आत्म-कथा पढ़कर एक बहुत पुरानी बात याद आ गयी. वही बताना चाहता हूं. हमारे फ़िल्म उद्योग में ज़िन्दगी में बहुत ही ज़्यादा उतार चढ़ाव भोगने पड़ते हैं, दूसरे क्षेत्रों से कहीं अधिक. हर फ़िल्म एक अग्नि-परीक्षा होती है. विशेष रूप से तकनीशियनों के लिये. कलाकारों को तो एक साथ कई फ़िल्में करने को मिल जाती हैं तो गणित के सिद्धान्त से उनको law of averages के अनुसार फ़िल्में फिर भी मिलती रह्ती हैं , मगर लेखक या निर्देशक की पह्ली फ़िल्म न चली तो फिर उबरना बड़ा मुश्किल हो जाता है.
जिनकी बात मैं बताने जा रहा हूं वह हमारे एक अज़ीज़ थे, जिन्हें मैं भाई साहब कहता था. मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े थे. कश्मीरी पंडित थे. कभी एक नामी स्टूडियो में एक मशहूर निर्देशक के सहायक रह चुके थे. साहित्य और संगीत के रसिक थे. अच्छे खाने के शौकीन थे. तकनीकी लिहाज़ से सुयोग्य भी थे. उनको एक फ़िल्म के निर्देशन का काम मिला. फ़िल्म बनी भी और रिलीज़ भी हुई पर चली नहीं. मैंने देखी नहीं थी इसलिये कह नहीं सकता कि वह कैसी बनी थी और क्यों नहीं चली. उससमय तक मैं उनसे नहीं मिला था. ख़ैर. फ़िल्म न चली तो भाई साहब पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. उस समय तक उनका पुराना स्टूडियो बन्द हो चुका था. वैसे भी अब सहायक का काम कर नहीं सकते थे. लिखने के काम की कोशिश की तो वह भी न मिली. घर में माँ थीं, पत्नी थी, तीन बच्चे थे. जमा पूँजी भी कुछ न थी. और होती भी तो कितने दिन चलती? ऐसे में एक सज्जन ने उनके
सामने एक प्रस्ताव रखा. उन दिनों नामी हस्तियों पर दो-दो रीलों की फ़िल्में बनाने का एक चलन हो गया था. ये फ़िल्में किसी कमज़ोर फ़िल्म के साथ added attraction के तौर पर दिखाई जाती थीं. प्रस्ताव यह था कि भाई साहब जॉनी वाकर पर एक ऐसी ही टू-रीलर बना दें. भाई साहब जॉनी को थोड़ा पह्चानते थे. प्रस्ताव लेकर जॉनी भाई के पास पहुँच गये. जॉनी ने आदर से बैठाया, चाय नाश्ता कराया. मगर प्रस्ताव सुनकर इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि एक तो वह इस तरह के प्रचार में यक़ीन नहीं करते. और दूसरे यह कि ऐसा ही प्रस्ताव लेकर उनके इन्दौर के पुराने मकान मालिक आये थे, जिनके उन पर बड़े एहसान भी थे, और जॉनी ने उनको भी मना कर दिया था. अब अगर वह भाई साहब का प्रस्ताव मान लेते हैं तो वह मकान मालिक बन्दा उन्के बारे में क्या सोचेगा? निराश भाई साहब उठने लगे, तो जॉनी ने हाथ पकड़ कर बिठा लिया और कहा –
“मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं. आप यह बताइये यह फ़िल्म बना कर आपको क्या मिल जाता?”
“यही कोई ढाई हज़ार मिल जाते.”
“तो आप एक काम करिये. आप मुझसे ढाई हज़ार रुपये ले जाइये और फ़िलहाल काम चलाइये. और जब सहूलियत हो जाये तो वापस कर दीजियेगा.” जॉनी ने कहा.
भाई साहब ने इनकार कर दिया. जॉनी ने फिर पूछा- “अच्छा आपका माहवार घर ख़र्च क्या आता होगा?”
“यही कोई ६ सौ रुपये.”
जॉनी ने कहा – “ तो आप ऐसा कीजिये, आप हर महीने मुझसे यह रक़म ले जाया करें और जब आपका आमदनी का कोई ज़रिया बन जाये तब वापस कर दीजियेगा.” और बिना जवाब का इन्तिज़ार किये, अन्दर गये और सात सौ रुपये लाकर भाई साहब के हाथों में रख दिये. भाई साहब “शुक्रिया” के सिवा और कुछ न कह सके, क्योंकि गला भर आया था. आँखों में आँसू छलक आये थे.
इसके बाद छ्ह महीने तक जॉनी वाकर भाई साहब को बुलवा बुलवा कर यह रक़म देते रहे. यही नहीं, जब भी भाई साहब जाते तो उनकी पसन्द की कोई न कोई चीज़ भी खिलाते. उसके बाद भाई साहब ने एक नया काम शुरू कर दिया और जाकर जॉनी को ख़ुशख़बरी देते हुये कहा कि अब वो रुपये नहीं लेंगे, और जल्द ही सारी रक़म वापस कर जायेंगे. जॉनी ने भाई साहब को मुबारकबाद कहा, और फिर बोले – काम तो आपने इसी महीने शुरू किया है, तो आमदनी तो आपको अगले माह से ही होगी, इसलिये ये रुपये तो आप इस माह भी ले जाइये. और सात सौ रुपये लाकर दे दिये.
कुछ दिनों बाद भाई साहब, उनचास सौ रुपये लेकर जॉनी के पास गये. मगर जॉनी वाकर ने कहा-“देखिये, आप मुझे जानते थे, इसलिये ज़रूरत के वक्त मेरे पास पहुँच सके थे. मगर कोई ज़रूरतमन्द ऐसा भी हो सकता है, जो मुझ तक नहीं पहुँच सकेगा, मगर आपको जानता होगा और आपके पास पहुँच सकता है. आप यह रुपये मेरी अमानत के तौर पर अपने पास रखिये और ऐसे ज़रूरतमन्द की मदद कर दीजियेगा.”
मैं नहीं समझता कि इसके बाद इसपर किसी टिप्पणी की ज़रूरत है. और अपने अज़ीज़ भाई साहब का नाम ज़ाहिर करना भी मैं मुनसिब नहीं समझता. यह क़िस्सा ख़ुद भाई साहब ने ही मुझे सुनाया था.
जिनकी बात मैं बताने जा रहा हूं वह हमारे एक अज़ीज़ थे, जिन्हें मैं भाई साहब कहता था. मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े थे. कश्मीरी पंडित थे. कभी एक नामी स्टूडियो में एक मशहूर निर्देशक के सहायक रह चुके थे. साहित्य और संगीत के रसिक थे. अच्छे खाने के शौकीन थे. तकनीकी लिहाज़ से सुयोग्य भी थे. उनको एक फ़िल्म के निर्देशन का काम मिला. फ़िल्म बनी भी और रिलीज़ भी हुई पर चली नहीं. मैंने देखी नहीं थी इसलिये कह नहीं सकता कि वह कैसी बनी थी और क्यों नहीं चली. उससमय तक मैं उनसे नहीं मिला था. ख़ैर. फ़िल्म न चली तो भाई साहब पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. उस समय तक उनका पुराना स्टूडियो बन्द हो चुका था. वैसे भी अब सहायक का काम कर नहीं सकते थे. लिखने के काम की कोशिश की तो वह भी न मिली. घर में माँ थीं, पत्नी थी, तीन बच्चे थे. जमा पूँजी भी कुछ न थी. और होती भी तो कितने दिन चलती? ऐसे में एक सज्जन ने उनके
सामने एक प्रस्ताव रखा. उन दिनों नामी हस्तियों पर दो-दो रीलों की फ़िल्में बनाने का एक चलन हो गया था. ये फ़िल्में किसी कमज़ोर फ़िल्म के साथ added attraction के तौर पर दिखाई जाती थीं. प्रस्ताव यह था कि भाई साहब जॉनी वाकर पर एक ऐसी ही टू-रीलर बना दें. भाई साहब जॉनी को थोड़ा पह्चानते थे. प्रस्ताव लेकर जॉनी भाई के पास पहुँच गये. जॉनी ने आदर से बैठाया, चाय नाश्ता कराया. मगर प्रस्ताव सुनकर इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि एक तो वह इस तरह के प्रचार में यक़ीन नहीं करते. और दूसरे यह कि ऐसा ही प्रस्ताव लेकर उनके इन्दौर के पुराने मकान मालिक आये थे, जिनके उन पर बड़े एहसान भी थे, और जॉनी ने उनको भी मना कर दिया था. अब अगर वह भाई साहब का प्रस्ताव मान लेते हैं तो वह मकान मालिक बन्दा उन्के बारे में क्या सोचेगा? निराश भाई साहब उठने लगे, तो जॉनी ने हाथ पकड़ कर बिठा लिया और कहा –
“मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं. आप यह बताइये यह फ़िल्म बना कर आपको क्या मिल जाता?”
“यही कोई ढाई हज़ार मिल जाते.”
“तो आप एक काम करिये. आप मुझसे ढाई हज़ार रुपये ले जाइये और फ़िलहाल काम चलाइये. और जब सहूलियत हो जाये तो वापस कर दीजियेगा.” जॉनी ने कहा.
भाई साहब ने इनकार कर दिया. जॉनी ने फिर पूछा- “अच्छा आपका माहवार घर ख़र्च क्या आता होगा?”
“यही कोई ६ सौ रुपये.”
जॉनी ने कहा – “ तो आप ऐसा कीजिये, आप हर महीने मुझसे यह रक़म ले जाया करें और जब आपका आमदनी का कोई ज़रिया बन जाये तब वापस कर दीजियेगा.” और बिना जवाब का इन्तिज़ार किये, अन्दर गये और सात सौ रुपये लाकर भाई साहब के हाथों में रख दिये. भाई साहब “शुक्रिया” के सिवा और कुछ न कह सके, क्योंकि गला भर आया था. आँखों में आँसू छलक आये थे.
इसके बाद छ्ह महीने तक जॉनी वाकर भाई साहब को बुलवा बुलवा कर यह रक़म देते रहे. यही नहीं, जब भी भाई साहब जाते तो उनकी पसन्द की कोई न कोई चीज़ भी खिलाते. उसके बाद भाई साहब ने एक नया काम शुरू कर दिया और जाकर जॉनी को ख़ुशख़बरी देते हुये कहा कि अब वो रुपये नहीं लेंगे, और जल्द ही सारी रक़म वापस कर जायेंगे. जॉनी ने भाई साहब को मुबारकबाद कहा, और फिर बोले – काम तो आपने इसी महीने शुरू किया है, तो आमदनी तो आपको अगले माह से ही होगी, इसलिये ये रुपये तो आप इस माह भी ले जाइये. और सात सौ रुपये लाकर दे दिये.
कुछ दिनों बाद भाई साहब, उनचास सौ रुपये लेकर जॉनी के पास गये. मगर जॉनी वाकर ने कहा-“देखिये, आप मुझे जानते थे, इसलिये ज़रूरत के वक्त मेरे पास पहुँच सके थे. मगर कोई ज़रूरतमन्द ऐसा भी हो सकता है, जो मुझ तक नहीं पहुँच सकेगा, मगर आपको जानता होगा और आपके पास पहुँच सकता है. आप यह रुपये मेरी अमानत के तौर पर अपने पास रखिये और ऐसे ज़रूरतमन्द की मदद कर दीजियेगा.”
मैं नहीं समझता कि इसके बाद इसपर किसी टिप्पणी की ज़रूरत है. और अपने अज़ीज़ भाई साहब का नाम ज़ाहिर करना भी मैं मुनसिब नहीं समझता. यह क़िस्सा ख़ुद भाई साहब ने ही मुझे सुनाया था.
Monday, December 31, 2007
नव वर्ष (२००८) पर आन्तरिक अभिनन्दन
नये वर्ष के पह्ले दिन
नयी डायरी खोलकर,पहले पन्ने के ऊपर,
लिखिये मेरा अभिनन्दन.
लिखिये मंगल कामना-
प्रगति-सम्रिद्धि पूर्ण हो वर्ष,
शान्ति-प्रीति का हो उत्कर्ष,
सदा रहे आनन्द घना.
या फिर झन्झट छोडकर,
दिल पर ही लिख लीजिये,
रोज याद कर लीजिये.
मन ही मन में मुस्का कर.
नयी डायरी खोलकर,पहले पन्ने के ऊपर,
लिखिये मेरा अभिनन्दन.
लिखिये मंगल कामना-
प्रगति-सम्रिद्धि पूर्ण हो वर्ष,
शान्ति-प्रीति का हो उत्कर्ष,
सदा रहे आनन्द घना.
या फिर झन्झट छोडकर,
दिल पर ही लिख लीजिये,
रोज याद कर लीजिये.
मन ही मन में मुस्का कर.
Tuesday, December 25, 2007
एक आभार
आज जन्मदिन है माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी का। श्रद्धा पूर्वक उनका अभिनन्दन करना चाहता हूँ, आन्तरिक शुभकामना के साथ, क्योंकि उनका एक एहसान याद आरहा है। (मेरे कुछ सुधी पाठकों का आग्रह मिला है, कि अपनी यादें और अनुभव सबके साथ बांटता रहूँ, इसीलिए यह याद लिख रहा हूँ।) बात जीवन-मृत्यु के समय की है। उक्त फिल्म में एक डिबेट का सीन लिखा था मैंने। सीन शूट भी हो चुका था। फिल्म पूरी एडिट हो चुकी थी। ट्रायल देखने के बाद तमान लोग सुझाव देने लगे थे कि इस डिबेट के स्थान पर एक गाना क्यों नहीं रखा गया? अक्सर फिल्मों में ऐसा ही तो होता है। यों भी जीवन मृत्यु में गाने सिर्फ दो ही थे। निर्माता सेठ ताराचंद जी भी उधेड़बुन में थे। एक पशोपेश का माहौल पैदा हो गया था। ऐसे में एक बार ट्रायल में हमारे प्रोडक्शन मैनेजर कैलाश पति सिंह अटलजी को ट्रायल में ले आये। फिल्म देखने के बाद थिएटर से निकलने पर अटलजी ने सबसे पहले डिबेट की प्रशंसा की . उसके बाद फिर किसी ने भी डिबेट की जगह गाना डालने की बात नहीं की। उनका यह आभार मैं सदा मानता रहूंगा । मेरी समझ से मैंने तमाम अलग अलग फिल्मों में जो सीन लिखे हैं उनमें यह डिबेट का सीन भी मेरा अन्यतम बढिया सीन है.
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